"Krushnayan" is written by kajal oza vaidh. it's full titel is 'krushnayan-manas thaine jiveli ishvar ni katha'. it is novel.
Each of these words in one line is superbly explored...
डोल भी रहे मस्ती में और जागे भी,
नाच भी रहे और जागे भी...
गीत को उठने दो, गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
चुप्पी को छुने दो लफ़्जों के नर्म तारों को,
चुप्पी को छुने दो, चुप्पी को छुने दो लफ़्जों के नर्म तारों को
और लफ़्जों को, और लफ़्जों को चुप्पी की गजल गाने दो।
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
खोल दो खिड़कियाँ सब, और उठा दो पर्दे,
नयी हवा को बंद घर में आने दो।
छत से झाँक रही कब से है चाँदनी की परी,
दिया बुझा दो, आँगन में उतर आने दो।
फ़िजाँ में छाने लगी है, फ़िजाँ में छाने लगी है बहार की रंगत
फ़िजाँ में छाने लगी है बहार की रंगत...
जुही को खिलने दो, जुही को खिलने दो और चम्पा को महक जाने दो।
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
जरा संभलने दो मीरा की थिड़कती पायल,
जरा संभलने दो, जरा संभलने दो मीरा की थिड़कती पायल,
जरा गौतम के सधे पाँव बहक जाने दो।
जरा संभलने दो मीरा की थिड़कती पायल,
जरा गौतम के सधे पाँव बहक जाने दो।
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
हँसते होठों को, हँसते होठों को जरा चखने दो अश्कों की नमी...
और नम आँखों को, और नम आँखों को जरा फ़िर से मुस्कुराने दो।
हँसते होठों को जरा चखने दो अश्कों की नमी...
और नम आँखों को, और नम आँखों को जरा फ़िर से मुस्कुराने दो।
दिल की बातें अभी झड़ने दो हरसिंगारों सी,
बिना बातों के कभी आँख को भर आने दो
रात को कहने दो कलियों से राज की बातें
गुलों के होठों से उन राजों को खुल जाने दो
जरा जमीं को अब उठने दो, जरा जमीं को अब उठने दो अपने पाँवों पर
जरा आकाश की बाहों को भी झुक जाने दो
जरा जमीं को अब उठने दो अपने पाँवों पर
जरा आकाश की बाहों को, जरा आकाश की बाहों को भी झुक जाने दो।
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
जरा संभलने दो मीरा की थिड़कती पायल,
जरा गौतम के सधे पाँव बहक जाने दो।
कभी मंदिर से भी उठने दो, कभी मंदिर से भी उठने दो अजान की आवाज
कभी मंदिर से भी उठने दो अजान की आवाज
कभी मस्जिद की घंटियों को भी बज जाने दो
कभी मस्जिद की घंटियों को भी बज जाने दो
पिंजरे के तोतों को दुहराने दो झूठी बातें,
अपनी मैना को तो, अपनी मैना को तो पर खोल चहचहाने दो।
उनको करने दो मुर्दा रस्मों की बर्बादी का गम
हमें नयी जमीं, नया आसमां बनाने दो।
एक दिन उनको उठा लेंगे सर आँखों पर
आज जरा खुद के तो पाँवों को संभल जाने दो
एक दिन उनको उठा लेंगे इन सर आँखों पर
आज जरा खुद के तो पाँवों को संभल जाने दो
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
जरा संभलने दो मीरा की थिड़कती पायल,
जरा गौतम के सधे पाँव बहक जाने दो।
जरा सागर को बरसने दो बन कर बादल
और बादल की नदी को सागर में खो जाने दो।
जरा चंदा की नर्म धूप में सेंकने को बदन
जरा सूरज की चाँदने में भींग जाने दो।
उसको खोने दो, उसको खोने दो जो कि पास कभी था ही नहीं
उसको खोने दो जो कि पास कभी था ही नहीं
जिसको खोया ही नहीं, जिसको खोया ही नहीं उसको फ़िर से पाने दो
उसको खोने दो जो कि पास कभी था ही नहीं
जिसको खोया ही नहीं उसको फ़िर से पाने दो
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
जरा संभलने दो मीरा की थिड़कती पायल,
जरा गौतम के सधे पाँव बहक जाने दो।
अरे हाँ हाँ हुए हम, लोगों के लिए दीवाने
अब लोगों को भी कुछ होश में आने दो
ये है सच कि बह्त कड़वी है मय इस साकी की
ये है सच कि बह्त कड़वी है मय इस साकी की,
रंग लाएगी गर साँसों में उतर जाने दो
छलकेंगे जाम जब छाएगी खुमारी घटा,
जरा मयखानों के पैमानों को तो संभल जाने दो
जरा साकी के तेवर तो बदल जाने दो।
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
जरा संभलने दो मीरा की थिड़कती पायल,
जरा गौतम के सधे पाँव बहक जाने दो।
न रहे मयखाना, न रहे मयखाना, न मैख्वार, न साकी, न शराब
नशे को ऐसे भी एक हद से गुजर जाने दो
उसको गाने दो, उसको गाने दो अपना गीत मेरे होठों से
उसको गाने दो अपना गीत मेरे होठों से
मुझे उसके सन्नाटे को गुनगुनाने दो।
जरा संभलने दो मीरा की थिड़कती पायल,
जरा गौतम के सधे पाँव बहक जाने दो।
गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
गीत को उठने दो, गीत को उठने दो और साज को छिड़ जाने दो...
Posted 8th June 2011 by Anoop Verma
માન તો રાખ્યું જ છે પણ મન નથી રાખ્યું તમે,
આપણા સંબંધમાં જીવન નથી રાખ્યું તમે.
એ ખરું કે સહેજ પણ બંધન નથી રાખ્યું તમે,
તોય પોતીકા સમું વર્તન નથી રાખ્યું તમે.
આટલા જલ્દી તમે ઘરડાં થયાં, કારણ કહું?
વાણી, વર્તન ક્યાંય પણ યૌવન નથી રાખ્યું તમે.
એ જ, એનો એ જ છે આજેય લબકારાનો લય,
કોઇને માટે અલગ કંપન નથી રાખ્યું તમે.
આપ કરતા હો છો મૃત્યુની જ વાતો હરઘડી,
જીવવાનું કોઇ આયોજન નથી રાખ્યું તમે?
– કિરણસિંહ ચૌહાણ
માન અને મન ! – એક માત્રાના ફરકમાં જિંદગી બદલાઈ ગઈ! શબ્દોની આવી કરામત જોઈએ ત્યારે ખાતરી થાય કે કવિ શબ્દો પાસે જતો નથી, શબ્દો કવિ પાસે આવે છે. ઉપરછલ્લું માન રાખવાનું આપણને સહુને રાસ આવી ગયું છે પણ સામાનું મન કેવી રીતે રાખવું જ્યારે ચૂકી જવાય છે ત્યારે સંબંધમાં માત્ર શરીર રહી જાય છે, જીવન ઓસરી જાય છે. અકાળે વૃદ્ધત્વ આવી જવાનું કારણ સમજાવતો શેર તો અજરામર થવા સર્જાયો છે… આખી ગઝલ એકદમ સરળ અને સહજ ભાષામાં પણ એક-એક શેર બિંદુમાં સિંધુ જેવા!
હું, માશૂક, બદલતો રહું છું !
એક જ રૂપ સદૈવ નિહાળી
રખે જાય હુંથી કંટાળી
એ બીકે તરફડતો રહું છું !
હું, માશૂક, બદલતો રહું છું !
. કદી વૈરાગી, કદી વિલાસી,
. કદી વૈભવરત, કદી ઉપવાસી,
. કદી પરિતૃપ્ત, કદી ચિરપ્યાસી,
. કદી અત્યાગ્રહી, કદી ઉદાસી,
. કદી અધૂરો, કદી છલતો રહું છું !
. હું, માશૂક, બદલતો રહું છું !
. કદી મિલનમાં પણ રહું ઠાલો,
. કદી વિરહમાં પણ મતવાલો,
. કદી ગંભીર, કદી અતિ કાલો,
. કદી સુક્કો, કદી લહેરી લાલો,
. કદી ટાઢો, કદી જલતો રહું છું !
. હું, માશૂક, બદલતો રહું છું !
. હું ચાંદો, સખિ, તું મુજ ધરતી,
. વધુઘટું રંગ તારો વરતી :
. આરતી બનીને તારા ફરતી
. પ્રદક્ષિણા પ્રીતિ મુજ કરતી !
. તૃપ્ત તોય ટળવળતો રહું છું !
. હું, માશૂક, બદલતો રહું છું !
– કરસનદાસ માણેક
Hello friends,